Thursday, May 27, 2021

शक्तियों का केंद्र शत्रु विनाशक माँ बगलामुखी


देवी भगवती की उपासना के लिए सबसे प्रमुख पर्व हैं नवरात्रि 

नवरात्रि का प्रमुख पर्व वर्ष में चार बार आता हैं. चैत्र की नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि इसके अलावा माघ मास की नवरात्रि और आषाढ़ मास की नवरात्रि.

आषाढ़ और माघ मास की नवरात्रि गुप्त नवरात्रि कहलाती हैं, इस नवरात्रि में देवी भगवती की दसमहाविद्या की आराधना की जाती हैं. देवी बगलामुखी (Baglamukhi Mata ) दस महाविद्या में से एक हैं.


गुप्त नवरात्रि में देवी की आराधना तंत्र मन्त्र और चमत्कारिक शक्तियों के लिए की जाती हैं. गुप्त नवरात्रियों में देवी के साथ प्रमुख रूप से शिव की आराधना की जाती हैं. देवी की गुप्त नवरात्रियों के दौरान बहुत नियम और अनुसाशन से रहना और पूजा के दौरान नियमो का पालन करना चाहिए. अगर साधक पूरे नियमो का पालन करते हुए देवी के गुप्त नवरात्रियों में पूजा करे तो उसे सारी शक्तिया और तंत्र-मंत्र से सबंधित ज्ञान सहज ही प्राप्त हो जाता हैं.



Baglamukhi  Mata Virat Katha

देवी बगलामुखी की कथा के सम्बन्ध में जो कथा हैं, वह इस प्रकार हैं. सतयुग के दौरान एक बार महाविनाशकारी तूफान आया. यह सब देखकर भगवन विष्णु घबरा गए. इस तूफान का कोई सामना नहीं कर पाया, सब तरफ हाहाकार मच गयी. भगवन विष्णु शंकर जी की शरण में गए. शंकर जी ने उन्हें शक्ति की आराधना करने के लिए कहा. भगवन विष्णु ने त्रिपुरासुंदरी का ध्यान किया.


त्रिपुरासुंदरी ने विष्णु की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान किया और महापीत देवी के ह्रदय से चतुर्दशी की रात्रि को देवी बगलामुखी  (Baglamukhi Mata) के रूप में प्रकट हो गयी. और उसके बाद उन्होंने उस प्रलयंकारी तूफान को शांत किया. 

देवी बगलामुखी का अर्थ हैं, दुल्हन. जो अप्रितम सौंदर्य की देवी हैं. बगला संस्कृत भाषा के वल्गा शब्द का हिंदी अर्थ हैं दुल्हन. तांत्रिक इसे स्तम्भन की देवी मानते हैं.

देवी बगलामुखी  (Baglamukhi Mata) में शक्तियों का केंद्र हैं. देवी की उपासना शत्रुओ के विनाश के लिए, शत्रुओ पर विजय की प्राप्ति के लिए की जाती हैं. पीताम्बरा के नाम से प्रसिद्ध देवी बगलामुखी की शक्तिया असीमित हैं. तीनो लोक में इनके समान शक्तिशाली कोई नहीं हैं. माँ बगलामुखी यन्त्र शत्रुओ पर विजय के लिए और मुकदमो में विजय के लिए बहुत उपयोगी यन्त्र हैं.



 Baglamukhi Mata Ka Mandir


माँ बगलामुखी (Baglamukhi Mata)  के विश्व में तीन ही महत्वपूर्ण मंदिर हैं. ये सिर्फ मंदिर ही नहीं अपितु इन्हे सिद्ध पीठ भी कहा जाता हैं. यहाँ आने पर सभी भक्तो की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.  माँ बगलामुखी के दरबार में जाने पर कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं लौटता. 

माँ बगलामुखी का एक प्रसिद्द मंदिर हिमांचल प्रदेश के काँगड़ा जिले में स्थित हैं. 

दूसरा मंदिर नलखेड़ा मध्य प्रदेश के शाजापुर में और 

तीसरा मंदिर भी मध्य प्रदेश के दतिया जिले में स्थित हैं.


Mata Baglamukhi Chalisa



माँ बगलामुखी चालीसा इस प्रकार हैं.

श्री गणेशाय नमः
श्री बगलामुखी चालीसा
नमो महाविधा बरदा , बगलामुखी दयाल |
स्तम्भन क्षण में करे , सुमइस ह्रीं रित अरिकुल काल
नमो नमो पीताम्बरा भवानी , बगलामुखी नमो कल्यानी
भक्त वत्सला शत्रु नशानी , नमो महाविधा वरदानी
अमृत सागर बीच तुम्हारा , रत्न जड़ित मणि मंडित प्यारा
स्वर्ण सिंहासन पर आसीना , पीताम्बर अति दिव्य नवीना
स्वर्णभूषण सुन्दर धारे , सिर पर चन्द्र मुकुट श्रृंगारे
तीन नेत्र दो भुजा मृणाला, धारे मुद्गर पाश कराला
भैरव करे सदा सेवकाई , सिद्ध काम सब विघ्न नसाई
तुम हताश का निपट सहारा , करे अकिंचन अरिकल धारा
तुम काली तारा भुवनेशी ,त्रिपुर सुन्दरी भैरवी वेशी
छिन्नभाल धूमा मातंगी , गायत्री तुम बगला रंगी
सकल शक्तियाँ तुम में साजें, ह्रीं बीज के बीज बिराजे
दुष्ट स्तम्भन अरिकुल कीलन, मारण वशीकरण सम्मोहन
दुष्टोच्चाटन कारक माता , अरि जिव्हा कीलक सघाता
साधक के विपति की त्राता , नमो महामाया प्रख्याता
मुद्गर शिला लिये अति भारी , प्रेतासन पर किये सवारी
तीन लोक दस दिशा भवानी , बिचरहु तुम हित कल्यानी
अरि अरिष्ट सोचे जो जन को , बुध्दि नाशकर कीलक तन को
हाथ पांव बाँधहु तुम ताके,हनहु जीभ बिच मुद्गर बाके
चोरो का जब संकट आवे , रण में रिपुओं से घिर जावे
अनल अनिल बिप्लव घहरावे , वाद विवाद न निर्णय पावे
मूठ आदि अभिचारण संकट . राजभीति आपत्ति सन्निकट
ध्यान करत सब कष्ट नसावे , भूत प्रेत न बाधा आवे
सुमरित राजव्दार बंध जावे ,सभा बीच स्तम्भवन छावे
नाग सर्प ब्रर्चिश्रकादि भयंकर , खल विहंग भागहिं सब सत्वर
सर्व रोग की नाशन हारी, अरिकुल मूलच्चाटन कारी
स्त्री पुरुष राज सम्मोहक , नमो नमो पीताम्बर सोहक
तुमको सदा कुबेर मनावे , श्री समृद्धि सुयश नित गावें
शक्ति शौर्य की तुम्हीं विधाता , दुःख दारिद्र विनाशक माता
यश ऐश्वर्य सिद्धि की दाता , शत्रु नाशिनी विजय प्रदाता
पीताम्बरा नमो कल्यानी , नमो माता बगला महारानी
जो तुमको सुमरै चितलाई ,योग क्षेम से करो सहाई
आपत्ति जन की तुरत निवारो , आधि व्याधि संकट सब टारो
पूजा विधि नहिं जानत तुम्हरी, अर्थ न आखर करहूँ निहोरी
मैं कुपुत्र अति निवल उपाया , हाथ जोड़ शरणागत आया
जग में केवल तुम्हीं सहारा , सारे संकट करहुँ निवारा
नमो महादेवी हे माता , पीताम्बरा नमो सुखदाता
सोम्य रूप धर बनती माता , सुख सम्पत्ति सुयश की दाता
रोद्र रूप धर शत्रु संहारो , अरि जिव्हा में मुद्गर मारो
नमो महाविधा आगारा,आदि शक्ति सुन्दरी आपारा
अरि भंजक विपत्ति की त्राता , दया करो पीताम्बरी माता
रिद्धि सिद्धि दाता तुम्हीं , अरि समूल कुल काल
मेरी सब बाधा हरो , माँ बगले तत्काल




Baglamukhi Sadhna

ऊँ ह्रीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां
वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्ववां कीलय
बुद्धि विनाशय ह्रीं ओम् स्वाहा

मन्त्र का उच्चारण साफ़ और स्पष्ट होना चाहिए. गलत मंत्रोचारण से अर्थ का अनर्थ हो सकता है.


बगलामुखी मंत्र का जाप करने वाला साधक सर्वशक्ति संपन्न हो जाता है। यह मंत्र अपने आप में ही बहुत बड़ी शक्ति है। पर यह भी आवश्यक है कि माँ बगलामुखी की पूजा या यंत्र मंत्र साधना गुरु की आज्ञा लेकर ही करनी चाहिए.



माँ बगलामुखी की साधना में ध्यान देने योग्य बातें निम्न प्रकार हैं:

1-आराधना काल में पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए.

2-साधना डरपोक किस्म के लोगों को नहीं करनी चाहिए। बगलामुखी देवी अपने साधक की परीक्षा भी लेती हैं। इसलिए साधक को भयभीत नहीं होना चाहिए.

3-माँ बगलामुखी की साधना रात्रि 9 से 12 बजे के दौरान करनी चाहिए। साधना गुप्त रूप से होनी चाहिए। साधना में एक समय भोजन करे। पीले वस्त्रों को ही धारण करना चाहिए.

शत्रुओ का नाश करने वाली परमात्मा की अजेय शक्ति ही माँ बगलामुखी है, जीवन को सरल और शत्रुओ के दमन के लिए माँ बगलामुखी की आराधना का विशेष महत्व हैं. 

Saturday, May 22, 2021

गढ़मुक्तेश्वर - शिव के गणो को जहा मिली थी पिशाच योनि से मुक्ति

 इतिहास के पन्नो को पलटे तो गढ़मुक्तेश्वर की जड़ें कुरु राजवंश हस्तिनापुर से जुडी मानी जाती हैं. एक ऐतिहासिक स्थान के रूप में प्रसिद्द गढ़मुक्तेशवर (Mukteshwar Temple) को बसाने का श्रेय गढ़वाल के राजाओ को जाता हैं. राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से मात्र 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गढ़मुक्तेश्वर एक ऐतिहासिक, आध्यात्मिक और पर्यटन की दृष्टि बहुत महत्वपूर्ण स्थान हैं.

गढ़मुक्तेश्वर में लगने वाला कार्तिक स्नान का उत्सव बहुत बड़ा उत्सव माना जाता हैं. इस उत्सव में अनेक तीर्थयात्री कार्तिक स्नान के लिए विशेष रूप से देश के कोने कोने से आते हैं. यहाँ पर शिव के गांव को पिशाच योनि से मुक्ति मिली थी, इसलिए इस शहर का नाम गढ़मुक्तेश्वर (गणो को मुक्त करने वाले ईश्वर ) के रूप में प्रसिद्द हैं.

Mukteshwar Mahadev Temple Garh Mukteshwar




गंगा किनारे बसा पावन और ऐतिहासिक शहर गढ़मुक्तेश्वर पर्यटन और धार्मिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण स्थान हैं. गंगा किनारे स्थित ये पावन शहर मंदिरो का केंद्र हैं. यहाँ स्थित मंदिरो में सबसे प्राचीन मंदिर मुक्तेश्वर महादेव (Mukteshwar Temple) का मंदिर हैं, इसी मंदिर के नाम पर मुक्तेश्वर का नाम पड़ा .



मुक्तेश्वर महादेव मंदिर देवी गंगा को समर्पित मंदिर हैं. इस मंदिर की स्थापना के बारे में मान्यता हैं की यह मंदिर ऋषि परशुराम ने बनाया था. मुक्तेश्वर महादेव के अलावा यहाँ अन्य महत्वपूर्ण मंदिर - मीराबाई की रेती, हनुमान मंदिर, वेदांत मंदिर हैं. मीराबाई की रेती मुक्तेश्वर मंदिर के सामने स्थित हैं. मान्यता हैं मीरा यहाँ रही और भजन ध्यान किया .


History of Mukteshwar Temple in Bhubneshwar


ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर के जिले खुर्द में स्थित मुक्तेश्वर धाम दो समूहों परमेश्वर मंदिर और मुक्तेश्वर मंदिर (Mukteshwar Temple) दो रुपो में हैं. मुक्तेश्वर मंदिर भगवन शिव को समर्पित मंदिर हैं जिसमे भगवान शिव, ब्रह्मा, विष्णु, पार्वती, नंदी की भी मूर्तियाँ विराजमान हैं. ओडिशा का मुक्तेश्वर मंदिर का निर्माण 970 ईसा पूर्व के आस पास हुआ था. इस मंदिर में शिवलिंग सफ़ेद संगमरमर का बना हुआ हैं. मंदिर में चित्रकारी से मंदिर को आकर्षक बनाया गया हैं.पंचतंत्र की कहानी को भी मंदिर में चित्रकारी से उकेरा गया हैं.


इस मंदिर तक जाने के लिए 100 सीढिया चढ़नी पड़ती हैं. नागर शैली और कलिंग शैली से निर्मित इस मंदिर की वास्तुकला और मंदिर में की गयी चित्रकारी मंदिर को भव्य और शानदार स्वरुप प्रदान करती हैं. मंदिर के तोरण में भी नक्काशी बहुत शानदार की गयी हैं. मंदिर के प्रवेश द्वार मगरमछ के सिर जैसे बने हुए हैं. हर साल इस मंदिर परिसर में उड़ीसा सरकार द्वारा एक नृत्य कार्यक्रम का आयोजन किया जाता हैं. नृत्य कार्यक्रम का यह आयोजन 3 दिन तक चलता हैं. इस कार्यक्रम में ओडिशा के प्रसिद्ध नृत्य ओडिशी को प्रस्तुत किया जाता हैं. इस अवसर पर यहाँ हजारो की संख्या में भक्त और पर्यटक यहाँ आते हैं.


Mukteshwar Temple In Pathankoat


मुक्तेश्वर मंदिर (Mukteshwar Temple) पठानकोट शहर के निकट स्थित हैं. यह मंदिर ब्रह्मा, विष्णु, हनुमान और माता पार्वती को समर्पित हैं, इस मंदिर का निर्माण पांडवो ने अपने अज्ञातवास के दौरान किया था. मान्यता हैं पांडव जब अपने अज्ञातवास के दौरान जब पंजाब आये तो उन्होंने पहाड़ो को काटकर शिव मंदिर का निर्माण किया. शिव का यह मंदिर बहुत प्राचीन और भव्य बना हुआ हैं.

 गुफा तक पहुंचने के लिए 164 सीढिया बनी हुयी हैं. इस मंदिर में पांडव अपने अज्ञातवास के दौरान 6 माह तक रुके थे. यहाँ उन्होंने शिवलिंग और एक हवन कुंड की स्थापना की थी, जो आज भी मौजूद हैं. यहाँ मनाये जाने वाले पर्व में महाशिवरात्रि का उत्सव बहुत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता हैं.


मुक्तेश्वर धाम अगर हम इसे मोक्ष का या मुक्ति का धाम कहे तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्युकी यहाँ शिव के गणो के साथ साथ विष्णु के गणो जय और अजय को भी मुक्ति मिली थी. इसलिए इसे गणमुक्तेश्वर धाम के नाम से जाना जाता हैं. मुक्त का अर्थ हैं जीवन और ईश्वर का अर्थ प्रभु. जो जीवन से मुक्ति प्रदान अर्थात मोक्ष प्रदान कर दें वह हैं ईश्वर.






मुक्तेश्वर (Mukteshwar Temple) नाम की एक जगह उत्तराखंड में भी स्थित हैं. यहाँ 10 सदी में स्थापित मुक्तेश्वर महादेव का मंदिर स्थित हैं. मान्यता हैं यह मंदिर कत्यूरी राजाओ द्वारा बनाया गया हैं.


Sunday, May 16, 2021

विश्व का पहला ग्रेनाइट से निर्मित बृहदेश्वर मंदिर

 Brihadeswar Temple

भारत देवो की भूमि रही हैं यहाँ के कण कण में ईश्वर विद्यमान हैं. भारत के हर राज्य में ईश्वर को समर्पित अनेक मंदिर, धाम-देवस्थान हैं. ऐसा ही एक अनुपम स्थान तमिलनाडु के तंजोर में स्थित बृहदीश्वरर का मंदिर हैं. यह एक हिन्दू मंदिर हैं. मंदिर का निर्माण ग्रेनाइट से किया गया हैं. मंदिर की शिल्पकला, वास्तुकला बहुत भव्य और अनूठी हैं. यूनेस्को द्वारा इसे विश्व धरोहर के रूप में सुरक्षित रखा गया हैं. मंदिर का निर्माण 1003 -1010 ईस्वी में प्रथम चोल शासक राजराज चोल ने करवाया था, इसलिए वृहदेश्वर मंदिर (Brihadeswar Temple) को राजराजेश्वर मंदिर भी कहा जाता हैं. मंदिर की उचाई लगभग 66 मीटर हैं, वृहदेशवर का मंदिर भगवान शिव को समर्पित हैं.


Brihadeswar Temple History


वृहदेश्वर मंदिर के इतिहास (History of Brihadeswar Temple)  को अगर हम देखे तो यह मंदिर का निर्माण राजराज चोल ने एक स्वपन के आधार पर बनाया था. राजराज चोल ने यह मंदिर यज्ञ और ईश्वर की उपासना के लिए बनाया था. चोल साम्राज्य का प्रतीक यह वृहदेश्वर मंदिर तमिल सभ्यता और वास्तुकला का एक अनूठा संगम हैं.


काँसा और बेहतरीन चित्रकारी से सुसज्जित यह मंदिर वास्तुकला और शिल्पकला का अनूठा उदहारण हैं. मंदिर में आकर्षण का प्रमुख केंद्र नंदी की बानी प्रतिमा हैं, जो एक ही शिला से बनायीं गयी हैं. इस प्रतिमा की ऊंचाई 16 लम्बी और 13 फ़ीट ऊंची हैं.

Brihadeswar Temple Facts


वृहदेश्वर मंदिर से जुड़े हुए कई तथ्य हैं, जो अपने आप में एक आश्चर्य हैं. आइये इन तथ्यों को जानते हैं.मंदिर में मूर्ति का नाम राजराजेश्वर हैं. वृहदेश्वर नाम इसे मराठाओ ने दिया था.

  • मंदिर के निर्माण में 1,30000 टन ग्रेनाइट लगा हुआ हैं, जबकि इस मंदिर के आस पास यहाँ से 100 किलोमीटर तक कोई ग्रेनाइट की सुरंग नहीं हैं
  • एक मिथक जो मंदिर के साथ जुड़ा हुआ हैं, वह ये हैं कि मंदिर के प्रमुख गुम्बद की छाया कभी जमीन पर नहीं पड़ती.
  • मंदिर के प्रमुख द्वार पर सुसज्जित नंदी की मूर्ति एक शिला को काटकर बनायीं गयी हैं. जो 16 फ़ीट लम्बी और 13 फ़ीट ऊंची हैं.



  • वृहदेश्वर मंदिर में मुख्य शिवलिंग की लम्बाई 12 फ़ीट की हैं
  • मंदिर को बनाने में 130,000 टन का पत्थर प्रयोग हुआ हैं. मंदिर के निर्माण कार्य में लगभग 7 वर्ष लगे. मंदिर की सरंचना इतनी मजबूत हैं, 7 बार भूकंप आने पर भी यह विशाल सरंचना मजबूती के साथ खड़ी हैं.
  • राजराजा चोल ने इसके अलावा मंदिर को 2500 एकड़ जमीन और मंदिर में दियो को जलाने के लिए घी की आपूर्ति हेतु 4000 गाय, 7000 बकरिया और भैसे दान की थी.

  • मंदिर को बनाने वाले राजा राजराजा चोल ने मंदिर में प्रबंधन के कार्य को सही ढंग से संचालित करने के लिए 192 कर्मचारियों की नियुक्ति की. उस समय प्रबंधन के लिए व्यक्तियो का नियुक्तिकरण यह भी राजराजा चोल की प्रबंधन नीति की कुशलता को दर्शाता हैं.

Brihadeswar Temple Information


बृहदेशवर मंदिर (Brihadeswar Temple)  हिन्दुओ का प्रसिद्ध मंदिर हैं, यह ग्रेनाइट से बना हुआ पहला मंदिर हैं. एक अन्य आश्चर्य का विषय यह भी हैं कि ग्रेनाइट को तराशना आसान नहीं हैं. क्युकी ख़ास किस्म के हीरे के टुकड़े लगे औजारों से ही ग्रेनाइट को तराशा जा सकता हैं. और उस समय बिना किसी आधुनिक औजारों से कैसे ग्रेनाइट को तराशकर ऐसे मूर्तियाँ बनायीं होगी , यह भी एक आश्चर्य का विषय हैं.



मंदिर के प्रवेश द्वार पर स्थित नंदी की मूर्ति जो एक पत्थर को ही तराशकर बनायीं गयी हैं. 16 फ़ीट लम्बी और 13 फ़ीट ऊंची नंदी की मूर्ति आपको आश्चर्य में डाल देगी .



विश्व के सबसे ऊंचे मंदिरो में से एक बृहदेश्वर का यह मंदिर अपनी चित्रकला और वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध हैं. मंदिर के गर्भगृह में बनी शिव की विभिन्न मुद्राओ में बनी चित्रकारी अंकित हैं. दक्षिण भारत के सभी मंदिरो की यह विशेषता हैं, इनमे बना गोपुरम. ये गोपुरम मंदिर को अनुपम सौंदर्य प्रदान करते हैं. वृहदेश्वर मंदिर (Brihadeeswarar Temple) में बना गोपुरम 80 टन का हैं, जिसकी यह विशेषता हैं कि इसकी जमीन पर छाया नहीं पड़ती.

Gangaikonda Cholapuram Temple Timings



वृहदेश्वर मंदिर चोल राजाओ द्वारा बनाई गई एक अनुपम और उत्कृष्ट शैली हैं. मंदिर में की गयी चित्रकारी और वास्तुकला मंदिर (Brihadeeswarar Temple)  को उत्कृष्टता प्रदान करती हैं. मंदिर में प्रवेश का समय प्रातकाल 6 बजे से अपराह्न 12 बजे तक हैं. सायंकाल में 4 बजे से रात्रि 8 बजे से हैं.

वृहदेश्वर मंदिर (Brihadeeswarar Temple)  विश्व के ऊँचे मंदिर में से एक हैं. ग्रेनाइट से बना यह पहला मंदिर हैं. इस मंदिर में विभिन्न प्रकार की चित्रकारिया, मंदिर की वास्तुकला, शिल्प कला, ग्रेनाइट से की गयी नक्काशी इसे भव्य स्वरुप प्रदान करती हैं. चोल राजाओ द्वारा निर्मित यह मंदिर अनुपम और उत्कृष्ट शैली की सरंचना हैं.

Thursday, May 13, 2021

सुचिन्द्रम मंदिर : त्रिदेव यहाँ पधारे थे शिशु रूप में

 


सृष्टि के त्रिदेव के रूप में ब्रह्मा ,विष्णु, महेश जी माने जाते हैं, वैसे तो ब्रह्मा , विष्णु और महेश के अनेको मंदिर भारत की भूमि में हैं पर जहा पर त्रिदेव एक साथ विद्यमान हो ऐसी पावन भूमि कन्याकुमारी के नजदीक सुचिन्द्रम (Suchindram Temple) हैं, जहा ब्रह्मा , विष्णु और महेश तीनो देवो की मूर्ति एक साथ विद्यमान हैं सुचिन्द्रम में तीनो देव लिंग के रूप में विद्यमान हैं.

Suchindram Temple Story - History of Suchindram Temple


सुचिन्द्रम मंदिर के इतिहास (history of Suchindram Temple)  को अगर हम जानना चाहे तो प्राचीन समय में यहाँ घना वन था, जहा ऋषि अत्रि अपनी पत्नी सती अनुसुइया के साथ रहते थे.देवी अनुसईया पति परायण स्त्री थी. उन्हें किसी भी व्यक्ति का शरीर परिवर्तित करने की शक्ति प्राप्त थी. जब त्रिदेवों की पत्नी को इस बात की जानकारी हुयी तो उन्होंने त्रिदेवो को सती अनुसुईया की शक्ति की परीक्षा लेने के लिए भेजा. तब ऋषि अत्रि हिमालय तपस्या करने गए थे .तब त्रिदेव साधु का रूप धारण कर सती अनुसुइया के पास भिक्षा मांगने के लिए गए , उस वक़्त सती अनुसुइया स्नान कर रही थी , त्रिदेवो ने उनसे उसी रूप में आकर भिक्षा देने के लिए कहा ,


प्रश्न यह था की देवी अनुसुइया अगर उसी रूप में त्रिदेव के सामने आती तो तो उनका पतिव्रत धर्म नष्ट होता , और अगर नहीं आती तो ब्राह्मणो को भिक्षा नहीं देने का पाप होता , तब देवी सती ने अपनी शक्ति से तीनो देवो को शिशु रूप में परिवर्तित कर दिया .जब त्रिदेवो की पत्नियों को अपने पति के शिशु रूप में परिवर्तित होने की जानकारी मिली तो वे व्याकुल होकर देवी सती अनुसुइया के पास आयी और उनसे क्षमा मांगने लगी. देवी अनुसुइया ने उन्हें क्षमा कर दिया और तीनो देवो को वापिस उनके रूप में परिवर्तित कर दिया ,लेकिन उन्होंने त्रिदेवो को प्रतीक रूप में अपने आश्रम में रहने को कहा . तब ब्रह्मा , विष्णु , महेश प्रतीक रूप में उसी स्थान पर विद्यमान हो गए .


एक अन्य कथा में जब देवराज इंद्र को ऋषि गौतम ने श्राप दिया तो , वे श्राप से मुक्ति पाने के लिए सुचिन्द्रम में तपस्या करने लगे और तत्पश्च्यात घृत से स्नान किया तब देवराज इंद्र शापमुक्त होकर अपने लोक स्वर्ग को चले गए . उसके बाद से इस स्थान का नाम सुचिन्द्रम पड़ा .


Suchindram Temple Dress Code

सुचिन्द्रम मंदिर (Suchindram Temple dress code) में प्रवेश को लेकर वेशभूषा का भी विशेष ध्यान दिया जाता हैं.कोई भी पाश्चात्य वेशभूषा को पहनकर मंदिर में प्रवेश करना वर्जित हैं. मंदिर में प्रवेश के साथ ही पुरुषो के लिए धोती या कुर्ता और महिलाओ के लिए साड़ी यहाँ की वेशभूषा हैं.

Special Features of Suchindram Temple


सुचिन्द्रम अनूठी स्थापत्य कला का एक केंद्र हैं.कन्याकुमारी से 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सुचिन्द्रम त्रिदेवो का मंदिर हैं. मंदिर में एक पुराना वृक्ष स्थापित हैं, जिसके खोखले भाग में त्रिदेव विराजमान हैं . मंदिर में हनुमान जी की 18 फ़ीट ऊँची मूर्ति स्थापित हैं.मंदिर में नवग्रह की मुर्तिया भी विराजमान हैं,


मंदिर की अन्य विशेषता के रूप में मंदिर में मौजूद चार संगीतमय स्तम्भ हैं.इन संगीतमय स्तम्भों से अलग अलग वाद्य यंत्रो की ध्वनि सुनाई देती हैं, प्राचीन काल में इन स्तम्भों का प्रयोग पूजा अर्चना में संगीत की ध्वनि उत्पन्न करने के लिए किया जाता था.

मंदिर का गोपुरम 134 फ़ीट ऊँचा हैं.मंदिर में स्थित नंदी की प्रतिमा 800 वर्ष पुरानी हैं.नंदी की मूर्ति बहुत विशाल हैं , मंदिर के पास ही एक सरोवर हैं, जिसके मध्य में एक दिव्य मंडप स्थित हैं. मंदिर में भगवन विष्णु ( bhagwaan Vishu ka mandir) की अष्टधातु की एक प्रतिमा विद्यमान हैं. इसके अलावा सीता राम की मूर्ति,स्थापित हैं, मंदिर में 30 पूजा स्थल हैं.


सुचिन्द्रम मंदिर (Suchindram Temple) की गणना त्रिदेवो के धार्मिक स्थल के रूप में की जाती हैं. माँ अनुसुइया के प्रभाव से त्रिदेवो के शिशु रूप में विराजित अलौकिक स्थान सुचिन्द्रम त्रिदेवो की नगरी कही जाये तो अतिशियोक्ति नहीं होगी.सुचिन्द्रम में स्थापित मंदिर भी स्थापत्य कला का एक उत्कृष्ट उदहारण हैं. मंदिर में मौजूद संगीतमय स्तम्भ भी मंदिर के आकर्षण का केंद्र हैं.